10 साल पुराने प्रकरण में अभियुक्त को न्यायालय द्वारा मिला न्याय अभियुक्त को उक्त प्रकरण मे दोष मुक्त कर बरी का निर्णय किया

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बीकानेर,दिनांक 24.02.2026 को एडवोकेट जयदीप कुमार शर्मा ने बताया कि माननीय न्यायालय विशिष्ट न्यायिक मजिस्ट्रेट (एन.आई.ऐक्ट प्रकरण) बीकानेर पीठासीन अधिकारी ललित कुमार, आरजेएस न्यायालय द्वारा फौजदारी प्रकरण सं. 1195/2022 में निर्णय दिया गया जिसकी पैरवी अभियुक्त की और से श्री जयदीप कुमार शर्मा, शैलेन्द्र खरे, मनोज जाजड़ा एडवोकेट ने की प्रकरण संक्षिप्त में इस प्रकार है कि हस्तगत प्रकरण के तथ्य संक्षिप्त में इस प्रकार हैं कि परिवादी जयदयाल ने अभियुक्त गिरधर गोपाल के विरुद्ध दिनांक 28.07.2015 को एक परिवाद अन्तर्गत धारा-138 परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 का न्यायालय के समक्ष इस आशय का पेश किया गया कि अभियुक्त के व परिवादी के मध्य अच्छी जान पहचान होने के कारण अभियुक्त ने परिवादी से अपनी निजी आवश्यकता की पूर्ति के लिए 30 दिसम्बर, 2015 से लेकर जनवरी, 2016 तक की अवधि के लिए 4,00,000/-रूपये उधार लिये थे जिसका भुगतान शीघ्र ही करने का आश्वासन दिया था। परिवादी द्वारा अभियुक्त से उक्त राशि बाबत् तकादा किये जाने पर अभियुक्त ने अपने उत्तरदायित्व के पूर्ण भुगतान हेतु एक चैक सं. 434058 राशि-4,00,000/-रूपये दिनांक 15.06.2016 बैंक स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एण्ड जयपुर शाखा गोगागेट कोचरान दादा बाड़ी, बीकानेर के परिवादी को दिये तथा आश्वासन दिया कि उक्त चैक का भुगतान परिवादी को प्राप्त हो जायेगा। जब परिवादी ने उक्त चैक का भुगतान प्राप्त करने के लिए अपनी बैंक केनरा बैंक, कोटगेट, बीकानेर में जमा करवाये, जहां से उक्त चैक को समाशोधन के लिए अभियुक्त की बैंक, स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एण्ड जयपुर शाखा गोगागेट कोचरान दादा बाड़ी, बीकानेर को भेजे, परन्तु अभियुक्त की बैंक द्वारा उक्त चैक को ष्च्ंलउमदज ेजवचचमक इल कतंूमतेष् के रिमार्क के साथ अनादरण कर दिया गया। परिवादी को उक्त चैक के अनादरण की जानकारी अपनी बैंक द्वारा दिनांक 28.06.2016 को प्राप्त हुई। चैक अनादरण की जानकारी प्राप्त होने के पश्चात परिवादी ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से दिनांक 02.07.2016 को अभियुक्त के सही व ज्ञात पते पर अभियुक्त ने लेने से गुरेज किया है तथा उक्त नोटिस मय लिफाफा दिनांक 13.07.2016 को ष्इंटीमेटष् के रेकॉर्ड के साथ पुनः परिवादी के अधिवक्ता को लौट आया है। अभियुक्त को उक्त नोटिस की जानकारी होने के पश्चात भी अभियुक्त ने परिवादी को चैक में वर्णित राशि का भुगतान आज दिनांक तक नहीं किया है। अंत में परिवादी को अभियुक्त से चैक में वर्णित राशि से दुगुनी राशि बतौर क्षतिपूर्ति दिलाये जाने तथा अभियुक्त को उसके उक्त कृत्य बाबत दण्डित किये जाने का निवेदन किया है। न्यायालय द्वारा दिनांक 28.07.2016 को मुल्जिम के विरुद्ध धारा-138 परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 के तहत प्रसंज्ञान लेकर प्रकरण दर्ज नियमित फौजदारी किया जाकर अभियुक्त को तलब किया गया। दिनांक 07.11.2016 को अभियुक्त के न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने पर न्यायालय द्वारा अभियुक्त को धारा-138 परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 के अन्तर्गत आरोप-सारांश मौखिक रूप से सुनाया व समझाया गया तो अभियुक्त ने सुन-समझकर अस्वीकार किया एवं अन्वीक्षा चाही। साक्ष्य परिवादी पूर्ण होने पर दिनांक 29.06.2018 को अभियुक्त को धारा- 313 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अन्तर्गत परीक्षित कर बयान लेखबद्ध किए गए तो स्वयं को निर्दाेष होना एवं उसे झूठा फँसाया जाना बताया। यह कथन किये कि चैक उसने परिवादी को सिक्योरिटी पेटे दिया था। परिवादी से विवाद हो जाने के बाद बैंक में ेजवच चंलउमदज का भी प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया कि उसके बाद परिवादी ने स्वयं चैक भरकर मुकदमा करवा दिया जो कि झूठा है। उसने परिवादी से कोई रकम उधार नहीं ली। न्यायालय द्वारा अपने आदेश दिनांकित 19-01- 2019 को स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एण्ड जयपुर शाखा गोगागेट बीकानेर के शाखा प्रबंधक को तलब किया गया, जिस पर न्यायालय गवाह सी. डब्ल्यू 01 मोहनलाल को दिनांक 11-04-2019 को न्यायालय द्वारा परीक्षित किया गया। परीक्षण के दौरान गवाह सी.डब्ल्यू 01 द्वारा निम्नलिखित दस्तावेज पेश किये। प्रदर्श पी.5 लौटा मूल लिफाफा मय प्राप्ति स्वीकृति ए.डी. है, जिस पर डाक विभाग का अंकन है कि प्राप्तकर्ता को सूचना कर दी गयी। प्रदर्श पी. 3 रजिस्टर्ड मूल विधिक नोटिस दिनांकित 02.07.2016 एवं प्रदर्श पी.5 लौटे मूल लिफाफे पर अभियुक्त का पता गिरधर गोपाल पुत्र ओमप्रकाश रील निवासी बान्द्रा बास, गोगागेट, बीकानेर होना अंकित किया गया है। उल्लेखनीय है कि अभियुक्त द्वारा अपना पता न्यायालय में भी यही पेश किया गया है। स्पष्ट रूप से अभियुक्त को उसके पते पर विधिक नोटिस प्रेषित किया गया है एवं डाक विभाग, बीकानेर द्वारा डाक की सूचना कर दी गयी थी। ऐसे में अभियुक्त यह बचाव नहीं ले सकता कि उसे जरिए रजिस्टर्ड डाक से उसके निवास स्थान के सही पते पर प्रेषित विधिक नोटिस दिनांकित 02.07.2016 की सूचना प्राप्त नहीं हुई। अभियुक्त अब भी हस्तगत प्रकरण में प्रश्नगत चैक में वर्णित राशि परिवादी को अदा करने को तैयार नहीं है एवं न ही अभियुक्त की ओर से स्वयं के न्यायालय में उपस्थित आने के पश्चात् भी प्रश्नगत चैक में वर्णित राशि अदा करने का कोई प्रस्ताव न्यायालय के समक्ष रखा गया। इस प्रकार न्यायालय के समक्ष परिवादी यह साबित करने में असफल रहा है कि अभियुक्त ने परिवादी को अपने विधिक दायित्व के भुगतान पेटे प्रश्नगत मूल चैक सं.434058 दिनांकित 15.06.2016, राशि-4,00,000/-रूपये, बैंक-स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एण्ड जयपुर, शाखा गोगागेट, कोचरों की दादा बड़ी, बीकानेर का स्वयं हस्ताक्षरित कर सुपुर्द किया। न्यायालय के समक्ष परिवादी यह साबित करने में सफल रहा है कि उपरोक्त प्रश्नगत मूल चैक अभियुक्त द्वारा भुगतान रुकवाये जाने के कारण अनादरित हो गया। न्यायालय के समक्ष परिवादी यह भी साबित करने में सफल रहा है कि परिवादी द्वारा उपरोक्त प्रश्नगत मूल चैक के अनादरण होने की सूचना व प्रश्नगत मूल चैक में वर्णित राशि की माँग करते हुए सूचना अभियुक्त को उसके निवास स्थान के सही पते पर प्रेषित की गई। न्यायालय मत में परिवादी द्वारा धारा-138 परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 के तहत आवश्यक सभी तथ्यों को न्यायालय के समक्ष साबित नहीं किया गया है। उपर्युक्त समस्त विवेचन के आधार पर अभियुक्त के विरूद्ध आरोपित धारा-138 परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 का अपराध पूर्णतः प्रमाणित एवं साबित नहीं पाए जाने पर, अभियुक्त गिरधर गोपाल को धारा-138 परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 के अपराध के आरोप में दोषमुक्त घोषित किया जाना न्यायालय न्यायोचित समझता है।

आदेश

फलतः अभियुक्त गिरधर गोपाल रील पुत्र ओमप्रकाश रील निवासी बान्द्रा बास, गोगागेट, बीकानेर को परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा-138 के अपराध में दोषमुक्त घोषित किया जाता है। अभियुक्त के द्वारा न्यायालय के समक्ष पूर्व के प्रस्तुत जमानत मुचलके निरस्त किए जाते हैं।

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