लोककल्याणार्थ आत्मोत्सर्ग, धैर्य, संयम तथा परोपकार ही शिवत्व का वास्तविक परिचायक है:- स्वामी विज्ञानानंद जी।

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बीकानेर (20 अगस्त 2026)दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा स्थानीय शिव पार्वती मंदिर में आयोजित पांच दिवसीय भगवान शिव कथा के आज दूसरे दिन दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के संस्थापक एवं संचालक दिव्य गुरु श्री आशुतोश महाराज जी के शिष्य कथा व्यास स्वामी विज्ञानानंद जी ने बताया कि सावन का पवित्र महीना भगवान शिव की आराधना और भक्ति के लिए विशेष माना जाता है। समुद्र मंथन प्रसंग शिव कथा का अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक प्रसंग है। पौराणिक कथाओं के अनुसार देवताओं और असुरों ने अमृत की प्राप्ति के लिए क्षीरसागर का मंथन किया। समुद्र मंथन से अनेक बहुमूल्य रत्नों के साथ-साथ अत्यंत विषैला हलाहल विष भी निकला। विष के प्रभाव से समस्त सृष्टि संकट में पड़ गई। तब भगवान शिव ने लोककल्याण के लिए उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया। इसी कारण वे नीलकंठ कहलाए। समुद्र मंथन प्रसंग त्याग और परोपकार का महान संदेश देता है। यह बताता है कि समाज और सृष्टि की रक्षा के लिए महान व्यक्तित्व अपने सुख की चिंता किए बिना संकट को स्वीकार करते हैं। भगवान शिव का विषपान हमें यह सीख देता है कि कठिन परिस्थितियों में धैर्य, संयम और त्याग के साथ लोकहित को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए।समुद्र मंथन प्रसंग का श्रवण श्रद्धालुओं को यह संदेश देता है कि जीवन में अमृत के साथ विष भी आता है, लेकिन विवेक, धैर्य और सकारात्मक सोच से कठिनाइयों का सामना किया जा सकता है। शिव आराधना और कथा श्रवण का यही सार मानव जीवन को सेवा, सद्भाव, त्याग और आध्यात्मिक चेतना से जोड़ना है।

ध्यातव्य है कि संस्थान की ओर से *मंथन* प्रकल्प चला कर समाज के अशिक्षित बच्चों के लिए शिक्षा के साधन उपलब्ध करवाए जा रहे हैं। स्वामी जी के अनुसार विद्या का दान समाजसेवा का सर्वोत्तम और दूरगामी माध्यम है। किसी जरूरतमंद विद्यार्थी को शिक्षा, पुस्तकें, अध्ययन सामग्री अथवा आर्थिक सहयोग प्रदान करना केवल उसकी वर्तमान आवश्यकता पूरी करना नहीं, बल्कि उसके भविष्य को सशक्त बनाना है। शिक्षित व्यक्ति अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक होकर समाज एवं राष्ट्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देता है।

शिक्षा दान से आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों को आगे बढ़ने का अवसर मिलता है और उनमें आत्मविश्वास तथा आत्मनिर्भरता की भावना विकसित होती है। समाज के सक्षम नागरिकों और संस्थाओं को चाहिए कि वे जरूरतमंद बच्चों की शिक्षा में सहयोग करें। एक विद्यार्थी को शिक्षित करना वास्तव में एक परिवार और समाज के भविष्य को संवारना है।

दूसरे दिवस कथा को विराम प्रभु की पावन आरती के साथ किया गया।

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