
बीकानेर। पर्यावरण पोषण यज्ञ समिति एवं आरएसवी ग्रुप ऑफ स्कूल्स के तत्वावधान में आयोजित तीन दिवसीय संवाद कार्यक्रम के अंतिम दिन रविवार प्रातः कार्यक्रम का शुभारंभ यज्ञ के साथ हुआ। इसके पश्चात स्वामी विवेकानंद परिव्राजक ने उपस्थित श्रोताओं से संवाद करते हुए यज्ञ के महत्व सहित आध्यात्मिक सुख, सकारात्मक सोच, ईश्वर चिंतन और निष्काम कर्म पर विचार रखे।
स्वामीजी ने कहा कि प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में यज्ञ का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा है। उन्होंने कहा कि आज के युग में प्रत्येक कार्य की एक सीमा और समय निर्धारित है। खाने, पीने, सोने तथा मनोरंजन सहित भौतिक सुखों का आनंद भी निश्चित समय तक ही लिया जा सकता है, जबकि आध्यात्मिक सुख की कोई सीमा नहीं होती। वेदों का अध्ययन और अच्छी पुस्तकों का पठन भौतिक सुखों की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ एवं स्थायी सुख प्रदान करता है।
उन्होंने कहा कि इंद्रियों से प्राप्त होने वाला सुख विद्या से मिलने वाले सुख की तुलना में बहुत कम है। भौतिक सुखों से राग-द्वेष बढ़ सकता है, जबकि वेदों के अनुसार इंद्रियों के एक सुख के साथ चार प्रकार के दुःख भी जुड़े होते हैं। ईश्वर का ध्यान करने से आध्यात्मिक सुख में वृद्धि होती है। ईश्वर को समझना अत्यंत आवश्यक है तथा उसकी विशेषताओं एवं लक्षणों का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए।
स्वामी विवेकानंद परिव्राजक ने कहा कि जो वस्तु जैसी है, उसे वैसा ही मानना आस्था है, जबकि उसकी कल्पना करना अंधविश्वास है। ईश्वर का ध्यान करते समय मन को एकाग्र रखना चाहिए और उस समय चित्त में केवल ईश्वर का चिंतन होना चाहिए। उन्होंने सकारात्मक सोच रखने का आह्वान करते हुए कहा कि दूसरों की सफलता देखकर विचलित नहीं होना चाहिए, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में सफलता के अनेक अवसर उपलब्ध होते हैं।
उन्होंने कहा कि सभी लोगों को समान सुख-सुविधाएं मिलना संभव नहीं है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन के महत्व को समझना चाहिए। संपूर्ण विश्व में अनेक प्राणी हैं, लेकिन बुद्धि मनुष्य को विशेष रूप से प्राप्त हुई है। ऐसे में मनुष्य को अपने जीवन के उद्देश्य और मूल्य पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
स्वामीजी ने ईश्वर के स्वरूप की व्याख्या करते हुए कहा कि ईश्वर एक है, सर्वव्यापी, निराकारी, चैतन्य, न्यायकारी और आनंदस्वरूप है। ईश्वर के बारे में जैसे-जैसे ज्ञान बढ़ता है, उसके प्रति श्रद्धा भी बढ़ती जाती है और व्यक्ति के दृष्टिकोण में व्यापक परिवर्तन आता है।
उन्होंने कहा कि छोटी-छोटी बातों पर दुखी नहीं होना चाहिए तथा अपने व्यवहार पर सदैव नियंत्रण रखना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति की बुद्धि अलग-अलग होती है और वह अपनी बुद्धि के अनुसार कार्य करता है। क्रोध को मन में नहीं रखना चाहिए, क्योंकि क्रोध बुद्धि का विनाश करता है। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य के अनुसार निष्काम कर्म अवश्य करना चाहिए।
स्वामीजी ने तनाव प्रबंधन के संबंध में कहा कि कार्यों की प्राथमिकता निर्धारित कर उन्हें क्रमबद्ध तरीके से पूरा करना चाहिए। इससे व्यक्ति अपने तनाव पर नियंत्रण रख सकता है। उन्होंने उपस्थित जिज्ञासुओं के विभिन्न प्रश्नों का तार्किक समाधान भी प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित प्रबुद्ध श्रोताओं ने संवाद को अत्यंत उपयोगी, प्रेरणादायी एवं ज्ञानवर्धक बताया।