
बीकानेर।रांगड़ी चाैक स्थित श्री सुगनजी महाराज के उपासरे में चातुर्मास कर रहीं साध्वी मुक्तांजनाश्रीजी म.सा. ने गुरुवार काे बताया कि जैन धर्म में श्रावकों (गृहस्थों) के लिए बारह व्रतों का विधान बताया गया है। इन बारह व्रतों में से आठवां व्रत ‘अनर्थदंड विरमण व्रत’ कहलाता है। यह तीन गुणव्रतों में से तीसरा और श्रृंखला का आठवां व्रत है, जो अनुव्रतों को मजबूती प्रदान करता है। उन्हाेंने नित्य प्रवचन में आठवां व्रत के बारे में बताया कि इस व्रत का मुख्य उद्देश्य बिना किसी प्रयोजन या आवश्यकता के किए जाने वाले पापों और प्रवृत्तियों से बचना है। उन्हाेंने कहा कि अपने दैनिक जीवन में बिना किसी कारण या मजबूरी के, मन, वचन और काया से पापकारी प्रवृत्तियों को न करना ही आठवां व्रत है। साध्वी मुक्तांजनाश्रीजी म.सा. ने कहा कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए कर्तव्यों के निर्वहन के लिए जो हिंसा या पाप होते हैं, वे तो मजबूरी हैं। लेकिन बिना कारण की जाने वाली हिंसा और मानसिक पापों को हम अपनी जागरूकता (विवेक) से पूरी तरह रोक सकते हैं। यह व्रत व्यक्ति को आत्म-नियंत्रण, पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता और सचेत जीवन जीने की कला सिखाता है। उन्हाेंने यह भी कहा कि कर्म में कभी शर्म नहीं करनी चाहिए। उपासरा ट्रस्ट के अध्यक्ष महावीर सिंह खजांची ने बताया कि ट्रस्ट के काेषाध्यक्ष प्रमाेद गुलगुलिया, सहमंत्री मनीष नाहटा, ट्रस्टी संदीप मुसरफ, अजय खजांची, सुरेंद्र खजांची, मालचंद बेगाणी, धीरज बरड़िया चातुर्मास की विभिन्न व्यवस्थाएं देख रहे हैं।