
बीकानेर। जैन धर्म के परम पर्वाधिराज पर्यूषण पर्व के दूसरे दिन रांगड़ी चाैक में श्री सुगनजी महाराज के उपासरे में साध्वी मुक्तांजनाश्रीजी म.सा. ने जैन श्रावक के लिए पांच मुख्य कर्तव्यों अमारि प्रवर्तन, साधर्मिक भक्ति, क्षमापना, अट्ठम तप और चैत्यपरिपाटी का पालन करने के विधान पर अपने विचार रखे।
ट्रस्टी महावीर सिंह खजांची ने बताया कि साध्वी मुक्तांजनाश्रीजी म.सा. ने कहा कि मन, वचन और शरीर से किसी भी जीव को कष्ट न पहुँचाना ही सच्चा अमारि प्रवर्तन है। अपने दैनिक जीवन में यह संकल्प लें कि हम किसी भी जीव की हिंसा का कारण न बनें और चारों ओर अहिंसा का वातावरण बनाएं। उन्हाेंने कहा कि समान धर्म का पालन करने वाले साधर्मिक भाई-बहनों के प्रति आदर और स्नेह रखना साधर्मिक वात्सल्य है।यह कर्तव्य हमें सिखाता है कि हम अपने सहधर्मियों के सुख-दुख में सहभागी बनें।
क्षमा पर्युषण पर्व का प्राण है। जाने-अनजाने में किसी भी जीव को मन, वचन या कर्म से पहुंचाए गए कष्टों के लिए सच्चे मन से पश्चाताप करना चाहिए। उन्हाेंने यह भी कहा कि इन्द्रियों पर संयम रखने के लिए तप का विशेष महत्व है। कम से कम तीन उपवास (अट्ठम तप) या अपनी शक्ति के अनुसार एकासन, आयंबिल आदि तपस्या करने का प्रयास किया जाता है। तप के माध्यम से आत्मा में जमे कर्मों की निर्जरा होती है और मन की वासनाएं क्षीण होती हैं। वीतराग प्रभु के दर्शन हमारे जीवन को मंगलमय बनाते हैं। सामूहिक रूप से संघ के साथ जिन मंदिरों में जाकर देवदर्शन, वंदन और पूजन करना चैत्यपरिपाटी कहलाता है। यह हमें रागी-द्वेषी प्रवृत्तियों से हटाकर वीतरागता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
ट्रस्ट के काेषाध्यक्ष प्रमाेद गुलगुलिया, सहमंत्री मनीष नाहटा ने बताया कि इस अवसर पर सुरेंद्र खजांची, धीरज बरड़िया, अजय खजांची सहित अनेक माैजूद रहे। गुलगुलिया ने यह भी बताया कि पर्यूषण पर्व के दाे दिनाें में एकासना का लाभ लेने वालाें में सुंदरलाल प्रदीप सेठी परिवार व कंवरलाल मनीष कुमार नाहटा परिवार रहा।