
बीकानेर, 7 अक्टूबर।जिंदगी ने जन्म के साथ ही चुनौती दे दी थी… वजन सिर्फ 980 ग्राम, गर्भकाल महज 28 सप्ताह और फेफड़े पूरी तरह विकसित भी नहीं हुए थे। हर सांस के लिए मशीन का सहारा लेना पड़ा, बीच में कई बार सांसें थमीं और इलाज के दौरान दोबारा वेंटिलेटर तक जाना पड़ा। लेकिन 56 दिनों तक चली चिकित्सकों, नर्सिंग स्टाफ और परिवार की जिद और मेहनत ने आखिरकार मौत पर जिंदगी की जीत लिख दी।
पीबीएम अस्पताल बीकानेर के बाल रोग विभाग की एनआईसीयू टीम ने अत्यंत कम जन्म वजन वाले इस नवजात का सफल उपचार कर उसे नया जीवन दिया। 10 अगस्त 2026 को चूरू जिले की एक परिधीय स्वास्थ्य इकाई में जन्मे इस बच्चे का वजन महज 980 ग्राम था। गंभीर श्वसन समस्या के चलते उसे 11 अगस्त को पीबीएम अस्पताल बीकानेर लाया गया, जहां एनआईसीयू में तत्काल उपचार शुरू किया गया।
पहली चुनौती—हर सांस को बचाना
28 सप्ताह में जन्म लेने के कारण नवजात के फेफड़े पूरी तरह विकसित नहीं थे। गंभीर श्वसन समस्या को देखते हुए चिकित्सकों ने तत्काल सर्फेक्टेंट थैरेपी दी और वेंटिलेटर सपोर्ट शुरू किया। रक्तचाप एवं अन्य महत्वपूर्ण शारीरिक मापदंडों को नियंत्रित रखने के लिए आवश्यक इनोट्रोपिक दवाएं दी गईं तथा जरूरत के अनुसार पैक्ड रेड ब्लड सेल ट्रांसफ्यूजन भी किया गया।
नवजात करीब 10 दिनों तक वेंटिलेटर पर रहा। स्थिति में सुधार होने पर उसे पहले सीपीएपी और बाद में नेजल प्रोंग ऑक्सीजन सपोर्ट पर लाया गया।
लेकिन जंग अभी खत्म नहीं हुई थी।
उपचार के दौरान नवजात को बार-बार एपनिया यानी अचानक सांस रुकने की समस्या होने लगी। स्थिति गंभीर होने पर उसे दोबारा इंट्यूबेट कर वेंटिलेटर पर रखना पड़ा। एनआईसीयू टीम के लिए यह उपचार का सबसे चुनौतीपूर्ण दौर रहा।
लगातार निगरानी और उपचार के बाद 28 अगस्त को नवजात को दोबारा सफलतापूर्वक वेंटिलेटर से हटा दिया गया। इसके बाद उसकी हालत में धीरे-धीरे स्थिर सुधार आने लगा।
मशीनों के साथ मां का स्पर्श भी बना इलाज का हिस्सा
नवजात की जिंदगी बचाने में अत्याधुनिक उपचार के साथ मां की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। शुरुआती दौर में ओजी ट्यूब के माध्यम से फीडिंग कराई गई। स्वास्थ्य में सुधार होने पर चम्मच से दूध देने की प्रक्रिया शुरू की गई और बाद में मां को स्तनपान के लिए प्रशिक्षित किया गया।
मां को नियमित रूप से कंगारू मदर केयर की सलाह दी गई। मां ने लगातार बच्चे को अपने सीने से लगाकर कंगारू मदर केयर दी, जिससे बच्चे के शरीर का तापमान बनाए रखने, वजन बढ़ाने और रिकवरी में मदद मिली।
980 ग्राम से 1265 ग्राम—56 दिन बाद बदली तस्वीर
करीब 56 दिनों के कठिन उपचार के बाद 5 अक्टूबर 2026 को नवजात का वजन बढ़कर 1265 ग्राम हो गया। सबसे बड़ी खुशी की बात यह रही कि बच्चा अब बिना किसी ऑक्सीजन सपोर्ट के स्वयं सांस ले रहा था और मां का दूध पी रहा था।
डिस्चार्ज से पहले आवश्यक जांचें भी कराई गईं। आरओपी स्क्रीनिंग सामान्य पाई गई। 2डी इको में कोई जन्मजात हृदय संबंधी समस्या सामने नहीं आई तथा ब्लड कल्चर भी स्टेराइल रहा। सुनने की क्षमता के आकलन के लिए BERA/OAE जांच फॉलोअप में कराने की सलाह दी गई है।
हर सांस पर नजर, हर पल टीम की निगरानी
इस चुनौतीपूर्ण केस की सफल रिकवरी बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. जी.एस. तंवर के मार्गदर्शन में एनआईसीयू टीम के सामूहिक प्रयासों से संभव हुई।
उपचार एवं निगरानी में डॉ. रेनू अग्रवाल, डॉ. कुलदीप सिंह बिठू, डॉ. लक्ष्मण, डॉ. इंदिरा, डॉ. अंजली, डॉ. भरत, डॉ. संजय, डॉ. हर्षित, डॉ. गैलेक्सी, डॉ. ईशा एवं डॉ. राजेश ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
वहीं नर्सिंग ऑफिसर्स बसंती, सिगार, धन्नाराम, अनिता, पायल, पिंकी, प्रियंका, तारा, सीमा एवं नवीन सहित समस्त नर्सिंग स्टाफ ने दिन-रात क्लीनिकल केयर करते हुए नवजात की हर सांस और हर बदलाव पर सतत निगरानी रखी।
“इंटैक्ट सर्वाइवल हमारी एनआईसीयू की सबसे बड़ी सफलता” — डॉ. तंवर
बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. जी.एस. तंवर ने कहा कि 980 ग्राम के नवजात का स्वस्थ होकर घर जाना भावनात्मक रूप से सुखद होने के साथ-साथ चिकित्सकीय दृष्टि से भी महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
उन्होंने कहा कि “इंटैक्ट सर्वाइवल जैसा सार्थक परिणाम निरंतर मॉनिटरिंग, प्रोटोकॉल आधारित उपचार और अनुशासित देखभाल का परिणाम है। यही हमारी एनआईसीयू की नींव है। यह उपलब्धि पूरी टीम के समर्पण, माता-पिता के विश्वास और ईश्वर की कृपा से संभव हुई है।”
टीम की क्लीनिकल दक्षता का प्रमाण है यह उपलब्धि — डॉ. एस.के. वर्मा
सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य एवं नियंत्रक डॉ. एस.के. वर्मा ने एनआईसीयू टीम को बधाई देते हुए कहा कि 980 ग्राम के अत्यंत कम वजन वाले नवजात का सफल उपचार बाल रोग विभाग और एनआईसीयू टीम की क्लीनिकल दक्षता का प्रमाण है।
उन्होंने कहा कि डॉ. जी.एस. तंवर के नेतृत्व में चिकित्सकों, नर्सिंग, पैरामेडिकल एवं सहयोगी स्टाफ ने जिस समर्पण के साथ कार्य किया, वह सराहनीय है।
डॉ. वर्मा ने कहा कि राजस्थान सरकार की निःशुल्क चिकित्सा योजनाओं के माध्यम से गंभीर एवं जटिल रोगियों को मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में उच्च स्तरीय उपचार उपलब्ध कराया जा रहा है। गंभीर बच्चों के टर्शियरी एवं क्वाटर्नरी स्तर के उपचार के लिए आमजन का मेडिकल कॉलेज अस्पतालों पर बढ़ता विश्वास इस व्यवस्था की महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
एक नजर में इस नन्ही जिंदगी की जंग
जन्म: 10 अगस्त 2026
जन्म स्थान: चूरू जिले की परिधीय स्वास्थ्य इकाई
गर्भकाल: 28 सप्ताह
जन्म वजन: 980 ग्राम
पीबीएम में भर्ती: 11 अगस्त 2026
वेंटिलेटर सपोर्ट: लगभग 10 दिन, बीच में दोबारा आवश्यकता
दोबारा वेंटिलेटर से मुक्ति: 28 अगस्त 2026
डिस्चार्ज: 5 अक्टूबर 2026
डिस्चार्ज वजन: 1265 ग्राम
स्थिति: बिना ऑक्सीजन सपोर्ट, स्वयं सांस और स्तनपान