
बीकानेर। जैन धर्म में ओळी (आयंबिल ओळी), तपस्या और जाप (नवकार जाप आदि) करने वाले आराधकों का बहुमान (आदर-सत्कार) करना बहुत ही पुण्य और अनुमोदना का कार्य माना जाता है। इस पावन प्रसंग पर आराधकों के त्याग और भक्ति की सराहना करने के लिए रांगड़ी चाैक स्थत श्री सुगनजी महाराज उपासरे में साध्वी मुक्तांजनाश्रीजी म.सा. के पावन सानिध्य में गुरुवार काे कार्यक्रम आयाेजित किया गया। ट्रस्ट के सहमंत्री मनीष नाहटा ने बताया कि साध्वी मुक्तांजनाश्रीजी म.सा. ने अपने प्रवचन में कहा कि अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर, सांसारिक सुखों से दूर रहकर जो ओळी, तपस्या और निरंतर जाप की कठिन साधना करता है वह हम सभी के लिए अत्यंत प्रेरणादायी है।इस अनुपम आत्मा-साधना, त्याग और अटूट श्रद्धा की हम भावपूर्ण अनुमोदना करते हैं। कठिन साधना समाज और परिवार के लिए गौरव का विषय है। सुख-साता पूर्वक पालना हो। उन्हाेंने कहा कि मन, वचन और काया से जैन धर्म की प्रभावना बढ़ाने वाले सभी तपस्वियों और जाप करने वाले महानुभावों ने अच्छा कार्य किया है। उन्हाेंने यह भी कहा कि तपस्या और मंत्र-जाप करने वालों का बहुमान भारतीय संस्कृति और विशेष रूप से जैन व सनातन परंपरा में बहुत पुण्यदायी और महत्वपूर्ण माना गया है।साध्वी मुक्तांजनाश्रीजी म.सा. ने यह भी कहा कि तपस्या से आत्मा पर लगे अनंत कर्मों का क्षय होता है और आत्मा निर्मल होती है।
नियमित मंत्र-जाप और साधना से आंतरिक ऊर्जा (प्राण और तपोबल) बढ़ती है। जो लोग कठिन तप (जैसे उपवास, एकासन या लंबी साधना) करते हैं, उनका संकल्प और आत्मबल साधारण व्यक्ति के लिए प्रेरणास्रोत होता है।ट्रस्ट के अध्यक्ष महावीर सिंह खजांची ने बताया कि तपस्वियों और साधकों का बहुमान करने से समाज में धर्म, त्याग और संयम के प्रति उत्साह बढ़ता है।ट्रस्ट के काेषाध्यक्ष प्रमाेद गुलगुलिया, ट्रस्टी संदीप मुसरफ ने बताया कि ट्रस्ट द्वारा उपासरे में समय-समय पर बहुमान में तपस्वियों की अनुमोदना (प्रशंसा व समर्थन) की जाती है, जिससे उनके तप का फल बना रहे और हमें भी उस अच्छे कार्य का पुण्य मिले।