अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर भाषणों की भरमार, स्वतंत्रता के साथ मर्यादा भी जरूरी : विद्वान

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बीकानेर। पर्यावरण पोषण यज्ञ समिति के तत्वावधान में आयोजित “मनुस्मृति समर्थन या विरोध कितना उचित?” विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय विद्वत विचार गोष्ठी के दूसरे दिन तृतीय एवं चतुर्थ सत्र में विद्वानों ने मनुस्मृति के पक्ष और विपक्ष में अपने विचार खुलकर व्यक्त किए। विभिन्न सत्रों में मनुस्मृति के सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, दंड व्यवस्था, स्त्री शिक्षा, पर्यावरण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े पहलुओं पर विस्तार से चर्चा हुई।

 

वक्ताओं ने कहा कि मनुस्मृति को केवल एक दृष्टिकोण से देखने के बजाय देश, काल और परिस्थितियों के संदर्भ में उसका अध्ययन किया जाना चाहिए। विद्वानों के अनुसार मनुस्मृति धर्मशास्त्र के साथ-साथ अर्थशास्त्र और दंडशास्त्र से जुड़े विषयों का भी उल्लेख करती है।

 

विचार गोष्ठी में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी गंभीर मंथन हुआ। वक्ताओं ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन स्वतंत्रता के साथ सामाजिक दायित्व और मर्यादा भी आवश्यक है। समाज और युवा पीढ़ी पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली अभिव्यक्ति को केवल स्वतंत्रता के नाम पर उचित नहीं ठहराया जा सकता।

 

वक्ताओं ने कहा कि मनुस्मृति में वर्ण व्यवस्था के संदर्भ में विशेषज्ञता एवं दायित्व के आधार पर समाज के प्रति उत्तरदायित्व की बात कही गई है। इसका उद्देश्य समाज में शिक्षा, संस्कार और ज्ञान का प्रसार करना था। वहीं आज के दौर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर समाज और युवा पीढ़ी के सामने प्रस्तुत की जा रही सामग्री कितनी उपयोगी और मर्यादित है, इस पर भी गंभीर विचार किया जाना चाहिए।

 

गोष्ठी में यह प्रश्न भी प्रमुखता से उठाया गया कि जो लोग मनुस्मृति का समर्थन करते हैं, क्या वे इसके प्रत्येक कथन को शत-प्रतिशत स्वीकार करते हैं और जो विरोध करते हैं, क्या वे इसके प्रत्येक पक्ष का पूर्ण विरोध करते हैं? वक्ताओं ने कहा कि किसी भी ग्रंथ का अध्ययन पूर्वाग्रह के बजाय तथ्य, संदर्भ और तुलनात्मक दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए।

 

विपक्ष की ओर से यह तर्क रखा गया कि भारतीय संविधान जब सभी नागरिकों को समानता का अधिकार प्रदान करता है, तो वर्तमान समय में किसी प्राचीन ग्रंथ की ओर लौटने की आवश्यकता क्यों महसूस की जाए। वहीं स्त्री शिक्षा और समाज में महिलाओं की उचित एवं सम्मानजनक स्थिति को लेकर भी विभिन्न विचार सामने आए। वक्ताओं ने कहा कि मनुस्मृति के संदर्भ में महिलाओं की स्थिति का अध्ययन भी तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों और वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था की तुलना के साथ किया जाना चाहिए।

 

विद्वानों ने कहा कि मनुस्मृति का वास्तविक संदेश सामान्य जन तक सही संदर्भ में पहुंचाना आवश्यक है, ताकि इसके संबंध में समाज में व्याप्त भ्रांतियों को दूर किया जा सके। स्वतंत्रता आवश्यक है, लेकिन उसकी भी एक निर्धारित सीमा और सामाजिक जिम्मेदारी होती है। सीमा का उल्लंघन होने पर स्वतंत्रता के दुरुपयोग की संभावना बढ़ जाती है।

 

विचार गोष्ठी के दौरान पर्यावरण एवं प्रदूषण के विषय पर भी मनुस्मृति के संदर्भ में वक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किए। प्रकृति संरक्षण, सामाजिक दायित्व और पर्यावरण के प्रति मनुष्य की भूमिका को लेकर विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई।

 

प्रथम सत्र की अध्यक्षता आचार्य रविंद्र ने की तथा संचालन आचार्य शिवनाथ ने किया। द्वितीय सत्र की अध्यक्षता डॉ. सुरेंद्र कुमार ने की तथा संचालन डॉ. दीपक आर्य ने किया।

 

दोनों सत्रों में मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. शत्रुंजय, डॉ. पुनीत चोपड़ा, ऋतु शर्मा, आचार्य रविशंकर, आचार्या शीतल, मुनि सत्यजीत, आचार्य रविंद्र तथा आचार्य डॉ. निरंजन लाल सहित अन्य विद्वानों ने मनुस्मृति के विभिन्न संदर्भों पर विस्तार से विचार रखे। वक्ताओं ने श्रोताओं की जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए मनुस्मृति को लेकर प्रचलित भ्रांतियों को दूर करने का प्रयास किया।

 

शिक्षाविद् स्वर्गीय रामनारायण स्वामी की स्मृति में आयोजित इस कार्यक्रम में उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए श्रद्धासुमन अर्पित किए गए। कार्यक्रम के समापन अवसर पर सत्संग एवं भजन संध्या का आयोजन हुआ। इसके पश्चात आर्ष न्यास एवं वैदिक शोध संस्थान के पदाधिकारियों द्वारा देशभर से पधारे विद्वानों का सम्मान किया गया तथा आभार एवं धन्यवाद ज्ञापित किया गया।

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