
बीकानेर, 22 अगस्त। ‘दुःखों से निवृत्ति एवं सुखों की प्राप्ति के उपाय’ विषयक तीन दिवसीय संवाद कार्यक्रम के दूसरे दिन होटल पाणिग्रहण में खचाखच भरे सभागार में स्वामी विवेकानंद परिव्राजक ने जीवन, कर्म और सुख-दुःख के कारणों पर विस्तार से संवाद किया।
स्वामी विवेकानंद परिव्राजक ने कहा कि जीवन एक परीक्षा कक्षा की तरह है, जिसमें अनेक विद्यार्थी परीक्षा दे रहे हैं और ईश्वर रूपी परीक्षक उनके कर्मों का मूल्यांकन कर रहा है। परीक्षा के दौरान गलत उत्तर में सुधार का अवसर नहीं होता, परीक्षा समाप्त होने के बाद ही सही और गलत का निर्णय होता है। इसी प्रकार मनुष्य को उसके कर्मों के अनुसार परिणाम प्राप्त होते हैं।
उन्होंने कहा कि जीवन की समस्याओं को समझने के लिए तीन प्रमुख बिंदुओं पर विचार करना चाहिए—समस्या क्या है, समस्या का कारण क्या है और कारण का निवारण क्या है। इन तीनों बिंदुओं के आधार पर कार्य किया जाए तो समस्या के समाधान का मार्ग स्वयं स्पष्ट होने लगता है।
स्वामी जी ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में दुःख आना स्वाभाविक है। दुःख का प्रमुख कारण इच्छाओं की पूर्ति नहीं होना अथवा इच्छाओं का निरंतर बढ़ते जाना है। इच्छाओं पर नियंत्रण रखकर दुःख को भी नियंत्रित किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि दूसरों से अत्यधिक अपेक्षाएं रखना भी दुःख का कारण बनता है। इसलिए अपेक्षाएं कम रखें और किसी कार्य के परिणाम में ‘हां’ या ‘ना’ दोनों परिस्थितियों के लिए मानसिक रूप से तैयार रहें।
उन्होंने कहा कि जाने-अनजाने सभी से गलतियां होती हैं। सहनशीलता मनुष्य का सुंदर आभूषण है। जीवन में सकारात्मक सोच रखते हुए अधिक से कम नुकसान को बेहतर मानना चाहिए। यदि व्यक्ति अपनी पूरी सामर्थ्य और ईमानदारी से किसी कार्य को करता है, लेकिन सामने वाला उसके प्रयास का उचित मूल्यांकन नहीं कर पाता, तो उसे निराश नहीं होना चाहिए। मनुष्य को अपना कर्म ईश्वर को समर्पित भाव से करना चाहिए और परिणाम की चिंता नहीं करनी चाहिए।
स्वामी जी ने ईश्वर के प्रति विश्वास बनाए रखने का आह्वान करते हुए कहा कि समय आने पर कर्मों का फल अवश्य प्राप्त होता है। उन्होंने स्वतंत्रता और स्वच्छंदता के अंतर को भी स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि अपनी इच्छा और बुद्धि के अनुसार कार्य करना स्वतंत्रता है, जबकि प्रकृति और कानून के विरुद्ध मनमानी करना स्वच्छंदता है। कानून सम्मत आचरण ही वास्तविक स्वतंत्रता है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य अपनी अच्छाइयों का फल तुरंत चाहता है, लेकिन बुराइयों के परिणाम को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं रहता। जबकि प्रकृति का नियम है कि अच्छे और बुरे दोनों कर्मों का परिणाम समय आने पर अवश्य प्राप्त होता है।
कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने स्वामी जी के विचारों को ध्यानपूर्वक सुना तथा संवाद के माध्यम से जीवन की समस्याओं के समाधान और सुख-शांति के उपायों पर मार्गदर्शन प्राप्त किया।