
बीकानेर। साध्वीश्री मुक्तांजनाश्रीजी म.सा. ने गुरुवार काे कहा कि इंसान पूरी उम्र भागदौड़ और संग्रह में लगा रहता है, लेकिन अंत में अहसास होता है कि जीवन रेत की तरह हाथों से फिसल गया। संदेश यह है कि खुद के परिवार और दुनियादारी के अलावा, दूसरों के जीवन में भी थोड़ा उजाला करना (परोपकार करना) जरूरी है। यानि तीन प्रहर बीत गए एक प्रहर बाकी है।
रांगड़ी चाैक के सुगनजी महाराज के उपासरे में चातुर्मासिक नित्य प्रवचन में यह बातें कहीं। उन्हाेंने कहा कि जैन धर्म के अनुसार, जो आत्मा के स्वरूप और उसके गुणों (चारित्र) का घात करते हैं, उन्हें कषाय कहा जाता है। मुख्य रूप से कषाय चार प्रकार के होते हैं क्रोध: गुस्सा या आक्रोश, जो खुद का और दूसरों का नुकसान करता है। मान: घमंड या अहंकार। माया: छल, कपट या कुटिलता (मन, वचन और कर्म में भिन्नता)। लोभ: लालच या धन-पदार्थों के प्रति अत्यधिक आसक्ति।
उपासरे में ट्रस्ट अध्यक्ष महावीर सिंह खजांची ने बताया कि आज के प्रवचन के समय श्रावकाें में प्रदीप सेठी, विजय चंद खजांची, ट्रस्ट के काेषाध्यक्ष प्रमाेद गुलगुलिया, श्राविका खुशाली पारख सहित अनेक माैजूद रहे। उन्हाेंने बताया कि बीस स्थानक समापन की दिव्य आराधना शु़क्रवार काे हाेगी।