
बीकानेर। पर्युषण महापर्व के सातवें दिन साेमवार काे रांगड़ी चाैक स्थित श्री सुगन जी महाराज के उपासरे में साध्वी मुक्तांजनाश्रीजी म.सा. ने कल्पसूत्र वाचन के अंतर्गत जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ, बाइसवें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ और तेईसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ का जीवन चरित्र वाचन किया। उन्हाेंने कहा कि पर्युषण पर्व के सातवें दिन इन महापुरुषों के जीवन चरित्र को श्रवण करने से भक्तों के मन में वैराग्य, करुणा और आत्म-शुद्धि का भाव जागृत होता है।
उपासरा ट्रस्ट के अध्यक्ष महावीर सिंह खजांची ने बताया कि साध्वी मुक्तांजनाश्रीजी ने बताया कि जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर (आदिनाथ) हैं। इक्ष्वाकु वंश में जन्मे भगवान आदिनाथ ने असार संसार से विरक्त होकर अनश्वर चेतना और मोक्ष को प्राप्त किया। इन्हें असि, मसि, कृषि और समाज व्यवस्था का प्रणेता माना जाता है।
भगवान नेमिनाथ जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर थे। ये भगवान श्रीकृष्ण के चचेरे भाई यदुवंश में उत्पन्न हुए थे। विवाह के समय बारात में मूक पशुओं की चीखें सुनकर इनका मन संसार से उचट गया और इन्होंने दीक्षा ग्रहण कर गिरिनार पर्वत पर मोक्ष प्राप्त किया
भगवान पार्श्वनाथ जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर थे। वाराणसी के राजा अश्वसेन और रानी वामादेवी के यहाँ इनका जन्म हुआ था। इन्होंने संयम मार्ग अपनाकर जैन धर्म के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और संमेद शिखर (पारसनाथ पहाड़ी) से निर्वाण प्राप्त किया।
अजय खजांची, सुरेंद्र खजांची, मालचंद बेगाणी, धीरज बरड़िया के साथ ट्रस्ट के काेषाध्यक्ष प्रमाेद गुलगुलिया, सहमंत्री मनीष नाहटा, ट्रस्टी संदीप मुसरफ ने संयुक्त रुप से पर्युषण पर्व के आठवें दिन मनाए जाने वाले जैन धर्म में क्षमा और आत्म-शुद्धता के सबसे पवित्र दिन संवत्सरी पर्व को लेकर लेकर विभिन्न चर्चा की।