बीकानेर, 26 अक्टूबर। अजित फाउंडेशन की ओर से प्रख्यात इतिहासकार एवं लेखक रामचंद्र गुहा की पुस्तक ‘आखिरी उदारवादी और अन्य आलेख’ पर पुस्तक समीक्षा कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में साहित्य, इतिहास, राजनीति, गांधीवादी विचारधारा और पर्यावरण संरक्षण के विभिन्न पहलुओं पर सारगर्भित चर्चा हुई। वक्ताओं ने पुस्तक को स्वतंत्र चिंतन, वैचारिक सहिष्णुता और समाज के प्रति बौद्धिक जिम्मेदारी को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम बताया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कवि एवं विचारक डॉ. नंदकिशोर आचार्य ने कहा कि रामचंद्र गुहा ने इस पुस्तक में आंकड़ों के बजाय व्यक्तियों के विचारों और जीवन की समग्रता को केंद्र में रखा है। उन्होंने कहा कि मनुष्य की स्वतंत्रता सबसे अधिक मूल्यवान है। पुस्तक स्वतंत्र सोच के महत्व को रेखांकित करती है और गांधी, नेहरू, विनोबा सहित अनेक महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों के विचारों को रोचक ढंग से प्रस्तुत करती है। डॉ. आचार्य ने कहा कि जीवन को किसी एक विषय तक सीमित करने के बजाय उसकी समग्रता को समझना जरूरी है, अन्यथा बौद्धिक विकास बाधित हो सकता है। पुस्तक आधुनिकता की उपलब्धियों के साथ उससे उत्पन्न होने वाली समस्याओं की ओर भी ध्यान आकर्षित करती है।
विशिष्ट अतिथि इतिहासवेत्ता डॉ. भंवर भादानी ने सेवाग्राम आश्रम के संदर्भ में गांधीजी के जीवन, अनुशासन और विचारधारा पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि राजनीति और विचारधारा अलग-अलग पहलू हैं। राजनीति समय के साथ बदलती रहती है, लेकिन अच्छी विचारधारा लंबे समय तक प्रासंगिक बनी रहती है। सत्ता परिवर्तन के बावजूद अच्छे विचारों और जनहितकारी कार्यों को आगे बढ़ाया जाना चाहिए।
सेवाग्राम से साहित्यिक संस्कृति तक की पड़ताल
पुस्तक समीक्षा पैनल में महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग की अध्यक्ष एवं साहित्यकार डॉ. मेघना शर्मा ने ‘कहीं से 766 किलोमीटर दूर सेवाग्राम’ अध्याय की समीक्षा की। उन्होंने इसे गांधीवादी विरासत के पुनर्मूल्यांकन का गंभीर बौद्धिक प्रयास बताया। उन्होंने कहा कि सेवाग्राम आश्रम की सादगीपूर्ण जीवनशैली, अनुशासन, व्यक्तिगत श्रम और सामुदायिक जिम्मेदारी गांधीजी के विचारों को समझने की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। नेहरू, सरदार पटेल, राजेंद्र प्रसाद, मौलाना आजाद और सरोजिनी नायडू जैसे नेताओं का सेवाग्राम पहुंचना गांधीजी की व्यापक राजनीतिक प्रासंगिकता को दर्शाता है।
राजकीय डूंगर महाविद्यालय के हिंदी साहित्य के आचार्य एवं साहित्यकार डॉ. ब्रजरतन जोशी ने पुस्तक के साहित्य संबंधी खंड पर विचार रखते हुए कहा कि गुहा साहित्य को केवल रचनाओं के सौंदर्य या लेखकों की उपलब्धियों तक सीमित नहीं रखते, बल्कि साहित्यकारों, आलोचकों, पत्रिकाओं, जीवनी, आत्मकथा, पुस्तक दुकानों और पाठकीय संस्कृति के आपसी संबंधों को भी सामने लाते हैं। उन्होंने कहा कि साहित्य एक व्यापक सामाजिक और बौद्धिक पारिस्थितिकी है, जिसका निर्माण लेखक, संपादक, पाठक और संस्थाएं मिलकर करती हैं।
पर्यावरण संरक्षण में गरीबों की भूमिका को किया रेखांकित
सिस्टर निवेदिता कॉलेज के प्राचार्य डॉ. रीतेश व्यास ने पर्यावरणविद् अनिल अग्रवाल पर आधारित अध्याय की समीक्षा की। उन्होंने कहा कि अनिल अग्रवाल ने पर्यावरण संरक्षण के विमर्श में गरीबों की भूमिका को प्रमुखता से स्थापित किया। चिपको आंदोलन के अनुभवों के माध्यम से उन्होंने बताया कि पर्यावरण के जिम्मेदार प्रबंधन में स्थानीय समुदायों और गरीबों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। डॉ. व्यास ने पर्यावरण संरक्षण, जल, जंगल, जैव विविधता और जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में अग्रवाल के योगदान का उल्लेख करते हुए सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की स्थापना तथा दिल्ली में वाहनों के लिए सीएनजी की दिशा में हुए प्रयासों को भी रेखांकित किया।
विरोधियों द्वारा दिया गया सम्मान भी महत्वपूर्ण
इतिहास विषय के व्याख्याता डॉ. मुकेश हर्ष ने पुस्तक के ‘वाजपेयी की नजर में नेहरू’ आलेख पर चर्चा करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति के योगदान का महत्व केवल उसके समर्थकों द्वारा किए गए मूल्यांकन से तय नहीं होता, बल्कि विरोधियों द्वारा दिया गया सम्मान भी महत्वपूर्ण होता है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में राजनीतिक दल और विचारधाराएं अलग हो सकती हैं, लेकिन इससे किसी प्रतिद्वंद्वी के योगदान को नकारा नहीं जाना चाहिए।
डॉ. हर्ष ने कहा कि इतिहास का उद्देश्य किसी को पूरी तरह महान या दोषी घोषित करना नहीं, बल्कि प्रमाणों के आधार पर उसके योगदान को समझना है। नागरिकों को वैचारिक सहिष्णुता बनाए रखनी चाहिए और लोकतांत्रिक समाज में असहमति के अधिकार का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति इस बात में है कि अलग-अलग विचार रखने वाले लोग भी एक-दूसरे के विचारों और योगदान का सम्मान करना सीखें।
कार्यक्रम का संयोजन करते हुए अजित फाउंडेशन के समन्वयक संजय श्रीमाली ने कहा कि ऐसे आयोजनों का उद्देश्य आमजन में पुस्तक पढ़ने की प्रवृत्ति विकसित करना तथा साहित्य और विचारों के माध्यम से स्वस्थ बौद्धिक संवाद को प्रोत्साहित करना है।
कार्यक्रम में मधु आचार्य, गजानंद व्यास, नदीम अहमद, माणक सुथार, महेश उपाध्याय, अविनाश व्यास, आनंद पुरोहित, जाकिर अदीब, सुनीता श्रीमाली, प्रमोद शर्मा, मनन, आनंद छंगाणी, उषा बिस्सा, दीक्षा व्यास, गोपाल व्यास, प्रवीण प्रजापत, मनीष जोशी, ओमप्रकाश सुथार और इमरोज नदीम सहित अनेक गणमान्यजन उपस्थित रहे।
