
बीकानेर। धर्मनगरी में रांगड़ी चौक स्थित श्री सुगनजी महाराज के उपासरे में शुक्रवार काे साध्वीश्री मुक्तांजनाश्रीजी म.सा. की निश्रा में श्रावक-श्राविकाओं ने बीस स्थानक पूजा में भाग लिया। जैन धर्म में बीस स्थानक पूजा और तप का अत्यंत विशेष और सर्वोच्च महत्व है। यह आराधना तीर्थंकर नाम-कर्म के उपार्जन (यानी भविष्य में तीर्थंकर बनने की योग्यता प्राप्त करने) का मुख्य कारण मानी जाती है। इस पूजा में बीस विशेष पदों (जैसे – अरिहंत पद, सिद्ध पद, प्रवचन पद, ज्ञान पद, दर्शन पद, चारित्र पद, तप पद आदि) की आराधना, मंत्र जाप और भक्ति की गयी। साथ ही बताया गया कि बीस स्थानक (20 विशिष्ट गुणों या पदों) की निष्कपट और शुद्ध भाव से आराधना करने से आत्मा ‘तीर्थंकर नाम कर्म’ का उपार्जन कर सकती है। इसमें अरिहंत, सिद्ध, प्रवचन, गुरु, स्थविर, उपाध्याय, साधु, दर्शन, विनय, चारित्र जैसी 20 परम पवित्र स्थितियों की पूजा और ध्यान किया गया। इस पूजा के दौरान श्रावक-श्राविकाओं ने विशेष रूप से अष्टप्रकारी द्रव्य जल, चंदन, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, दीप, धूप, फल के साथ पूजा करने के दाैरान त्याग, तप (जैसे उपवास या आयंबिल), जप और देव-गुरु की वंदना की। पूजा के लिए आयाेजकाें की ओर से श्रावक-श्राविकाओं काे यंत्र के साथ-साथ सामग्री भी दी गयी। तत्पश्चात् शांतिनाथ भगवान का जैकारा भी लगाया गया।
ट्रस्ट के अध्यक्ष महावीर सिंह खजांची ने बताया कि इस अवसर पर चित्तलेहांगनाश्री जी म.सा., चित्तखरांजनाश्री जी म.सा. सहित अनेक साध्वीगण माैजूद थे। वहीं व्यवस्थाओं में सहयाेग करने वालाें में ट्रस्टी संदीप मुसरफ, सहमंत्री मनीष नाहटा, काेषाध्यक्ष प्रमाेद गुलगुलिया शामिल रहे।
साध्वीश्री मुक्तांजनाश्रीजी म.सा. ने प्रवचन में कहा कि गुरु भगवान का वंदन करें। मन में उठने वाली बुरी भावनाओं और विकाराें काे पहचान कर उन्हें धीरे-धीरे बाहर निकालें। साथ ही बाेलने से पहले उसके परिणामाें के बारे में साेचें और नपे-तुले शब्दाें का प्रयाेग करें। उन्हाेंने कहा कि साथ ही जीभ, नेत्र और कानाें जैसी प्रमुख इंद्रियाें लालसाओं पर संयम रखें। आज हुई बीस स्थानक पूजा के कार्यक्रम का संचालन करते हुए सहमंत्री मनीष नाहटा ने बताया कि शनिवार काे साध्वीश्री मुक्तांजनाश्रीजी म.सा. के चातुर्मासिक नित्य प्रवचन के दाैरान तपस्वियाें का बहुमान किया जाएगा।