
बीकानेर। साध्वी मुक्तांजनाश्रीजी म.सा. ने बुधवार काे कहा कि मन का स्वभाव चंचल होता है, लेकिन ‘मन की सुनो’ का अर्थ क्षणिक इच्छाओं के पीछे भागना नहीं, बल्कि अपनी अंतरात्मा और विवेक की गहरी आवाज़ को पहचानना है।
रांगड़ी चाैक स्थित श्री सुगन जी महाराज के उपासरे में चातुर्मास के दाैरान नित्य प्रवचन में साध्वी मुक्तांजनाश्रीजी म.सा. ने यह बात कही। उन्हाेंने कहा कि मन एक सेकंड में कई दिशाओं में भागता है। दुनिया की चीजें और परिस्थितियां मन को भटकाती हैं। पुरानी आदतें और इच्छाएं मन को स्थिर नहीं रहने देतीं। जरुरी नहीं कि मन की हर बात सही हाे। यह लालच या डर में आकर गलत फैसले भी ले सकता है।
इसके लिए अंतरात्मा की आवाज सुननी चाहिए। जब आप शांत होते हैं, तब जो आवाज़ आती है, वही आपका विवेक है।
साध्वी मुक्तांजनाश्रीजी म.सा. ने यह भी कहा कि अच्छे कर्म करने से मन में शांति आती है, रोज़ कुछ देर आंखें बंद करके सांसों पर ध्यान लगाना चाहिए। साथ ही सकारात्मक विचार रखने वाले लोगों के साथ रहें। उन्हाेंने कहा कि भगवान या सकारात्मक मंत्र का जाप करने से मन स्थिर होता है।
उपासरा ट्रस्ट के अध्यक्ष महावीर सिंह खजांची ने बताया कि प्रवचन में चित्तलेहांजनाश्री जी म.सा., सुरक्षांजनाश्रीजी म.सा., साैम्यांजनाश्रीजी म.सा., चित्तखरांजनाश्रीजी म.सा. भी उपासरे में माैजूद रहे। उन्हाेंने बताया कि ट्रस्ट के काेषाध्यक्ष प्रमाेद गुलगुलिया, सहमंत्री मनीष नाहटा, ट्रस्टी संदीप मुसरफ चातुर्मास की विभिन्न व्यवस्थाएं देख रहे हैं।